- गांधीजी के मतानुसार - ''परमात्मा ही सत्य है शुध्द अन्तरात्मा की वाणी ही सत्य है। लोक सेवा ईश्वर प्राप्ति के साधन का आवश्यक अंग है। गांधीजी मानव समूह को भगवान का विराट रूप मानते थे और उनकी सेवा को भगवान की सेवा।''
- एक व्यावहारिक दर्शन- गांधीवाद वास्तविकता पर आधारित है। गांधीजी कर्मयोगी थे। कर्म मे विश्वास करते थे। उनका दर्शन उनके निजी अनुभवो सत्य के प्रयोगो आरै अहिंसा पर आधारित है।
- सत्याग्रह- गांधीवाद का मूल आधार सत्याग्रह है। सत्याग्रह का अर्थ सत्य को आरूढ़ करना। सत्याग्रह मे छलकपट धोखा का परित्याग कर प्रेम एवं सत्य के नैतिक शास्त्र का प्रयोग करना पडता है। सत्याग्रह तो शक्तिशाली और वीर मनुष्य का शस्त्र है।
- अहिंसा पर आधारित- गांधीजी का मत था कि अहिंसा के आधार पर ही एक सुव्यवस्थित स माज की स्थापना और मानव जीवन की भावी उन्नति हो सकती है। अहिंसा का अर्थ किसी भी रूप मे अन्य किसी व्यक्ति को कष्ट न पहुंचाना है। एवं अत्याचारी की इच्छा का आत्मिक बल के आधार पर प्रतिरोध करना भी है। अहिंसा आत्मिक बल का प्रतीक है।
- आदर्श राज्य की स्थापना- गांधीजी अहिंसा पर आधारित ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते थे। जिसमे समस्त मानव सदगुणी एवं विवेकशील हो । उसमें स्वार्थमयी हितो का कोई स्थान न हो। सभी सुखी संपन्न एव निश्चित जीवन यापन करेंगे।
- सर्वोदय- गांधीजी सभी लोगो की उन्नति उदय एवं कल्याण मे विश्वास करते थे। उनका विश्वास था कि उपेक्षित गरीबो के उत्थान से ही समाज एवं राष्ट्र की प्रगति संभव है।
- छूआछूत विरोधी- छूआछूत समाज का एक गम्भीर दोष रहा है। गांधीजी समाज में व्याप्त छूआछूत को मिटाकर सामाजिक एकता स्थापित करना चाहते थे समाज में अछूतो के विकास एवं कल्याण के लिए उन्होने उनको ''हरिजन'' नाम दिया।
- विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था तथा न्यासधारिता का सिध्दांत- गांधीवाद मे आर्थिक विकेन्द्रीकरण के साथ साथ न्यासधारिता के सिध्दांत का भी उल्लेख किया गया है उनका विचार था कि पूंजीपतियो को हृदय परिवर्तन द्वारा सम्पत्ति की न्यासी (ट्रस्टी) बना दिया जाय और पूंजीपति उस सम्पत्ति का प्रयोग सम्पूर्ण समाज के हित के लिये करें।
- साध्य तथा साधन- गांधीवाद पूर्णतया एक नैतिक दर्शन है। साध्य के साथ साथ साधन भी नैतिक हो इस बात पर गांधीवाद में विशेष जोर दिया गया है। उनका मत था कि यदि पवित्र साधन नही मिलते हो तो उस साध्य को ही छोड़ दो।
- विश्व बन्धुत्व और अन्तर्राष्ट्रवाद का समर्थन- गांधीजी मानव कल्याण के समर्थक थे। वे समस्त मानव का हित चिंतन करते थे। उनहोने सामा्रजयवाद का विरोध किया तथा विश्व शांति तथा अन्तर्राष्ट्रवाद का समर्थन किया।
- गांधीजी के मतानुसार - ''परमात्मा ही सत्य है शुध्द अन्तरात्मा की वाणी ही सत्य है। लोक सेवा ईश्वर प्राप्ति के साधन का आवश्यक अंग है। गांधीजी मानव समूह को भगवान का विराट रूप मानते थे और उनकी सेवा को भगवान की सेवा।''
- एक व्यावहारिक दर्शन- गांधीवाद वास्तविकता पर आधारित है। गांधीजी कर्मयोगी थे। कर्म मे विश्वास करते थे। उनका दर्शन उनके निजी अनुभवो सत्य के प्रयोगो आरै अहिंसा पर आधारित है।
- सत्याग्रह- गांधीवाद का मूल आधार सत्याग्रह है। सत्याग्रह का अर्थ सत्य को आरूढ़ करना। सत्याग्रह मे छलकपट धोखा का परित्याग कर प्रेम एवं सत्य के नैतिक शास्त्र का प्रयोग करना पडता है। सत्याग्रह तो शक्तिशाली और वीर मनुष्य का शस्त्र है।
- अहिंसा पर आधारित- गांधीजी का मत था कि अहिंसा के आधार पर ही एक सुव्यवस्थित स माज की स्थापना और मानव जीवन की भावी उन्नति हो सकती है। अहिंसा का अर्थ किसी भी रूप मे अन्य किसी व्यक्ति को कष्ट न पहुंचाना है। एवं अत्याचारी की इच्छा का आत्मिक बल के आधार पर प्रतिरोध करना भी है। अहिंसा आत्मिक बल का प्रतीक है।
- आदर्श राज्य की स्थापना- गांधीजी अहिंसा पर आधारित ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते थे। जिसमे समस्त मानव सदगुणी एवं विवेकशील हो । उसमें स्वार्थमयी हितो का कोई स्थान न हो। सभी सुखी संपन्न एव निश्चित जीवन यापन करेंगे।
- सर्वोदय- गांधीजी सभी लोगो की उन्नति उदय एवं कल्याण मे विश्वास करते थे। उनका विश्वास था कि उपेक्षित गरीबो के उत्थान से ही समाज एवं राष्ट्र की प्रगति संभव है।
- छूआछूत विरोधी- छूआछूत समाज का एक गम्भीर दोष रहा है। गांधीजी समाज में व्याप्त छूआछूत को मिटाकर सामाजिक एकता स्थापित करना चाहते थे समाज में अछूतो के विकास एवं कल्याण के लिए उन्होने उनको ''हरिजन'' नाम दिया।
- विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था तथा न्यासधारिता का सिध्दांत- गांधीवाद मे आर्थिक विकेन्द्रीकरण के साथ साथ न्यासधारिता के सिध्दांत का भी उल्लेख किया गया है उनका विचार था कि पूंजीपतियो को हृदय परिवर्तन द्वारा सम्पत्ति की न्यासी (ट्रस्टी) बना दिया जाय और पूंजीपति उस सम्पत्ति का प्रयोग सम्पूर्ण समाज के हित के लिये करें।
- साध्य तथा साधन- गांधीवाद पूर्णतया एक नैतिक दर्शन है। साध्य के साथ साथ साधन भी नैतिक हो इस बात पर गांधीवाद में विशेष जोर दिया गया है। उनका मत था कि यदि पवित्र साधन नही मिलते हो तो उस साध्य को ही छोड़ दो।
- विश्व बन्धुत्व और अन्तर्राष्ट्रवाद का समर्थन- गांधीजी मानव कल्याण के समर्थक थे। वे समस्त मानव का हित चिंतन करते थे। उनहोने सामा्रजयवाद का विरोध किया तथा विश्व शांति तथा अन्तर्राष्ट्रवाद का समर्थन किया।
- गांधीजी के मतानुसार - ''परमात्मा ही सत्य है शुध्द अन्तरात्मा की वाणी ही सत्य है। लोक सेवा ईश्वर प्राप्ति के साधन का आवश्यक अंग है। गांधीजी मानव समूह को भगवान का विराट रूप मानते थे और उनकी सेवा को भगवान की सेवा।''
- एक व्यावहारिक दर्शन- गांधीवाद वास्तविकता पर आधारित है। गांधीजी कर्मयोगी थे। कर्म मे विश्वास करते थे। उनका दर्शन उनके निजी अनुभवो सत्य के प्रयोगो आरै अहिंसा पर आधारित है।
- सत्याग्रह- गांधीवाद का मूल आधार सत्याग्रह है। सत्याग्रह का अर्थ सत्य को आरूढ़ करना। सत्याग्रह मे छलकपट धोखा का परित्याग कर प्रेम एवं सत्य के नैतिक शास्त्र का प्रयोग करना पडता है। सत्याग्रह तो शक्तिशाली और वीर मनुष्य का शस्त्र है।
- अहिंसा पर आधारित- गांधीजी का मत था कि अहिंसा के आधार पर ही एक सुव्यवस्थित स माज की स्थापना और मानव जीवन की भावी उन्नति हो सकती है। अहिंसा का अर्थ किसी भी रूप मे अन्य किसी व्यक्ति को कष्ट न पहुंचाना है। एवं अत्याचारी की इच्छा का आत्मिक बल के आधार पर प्रतिरोध करना भी है। अहिंसा आत्मिक बल का प्रतीक है।
- आदर्श राज्य की स्थापना- गांधीजी अहिंसा पर आधारित ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते थे। जिसमे समस्त मानव सदगुणी एवं विवेकशील हो । उसमें स्वार्थमयी हितो का कोई स्थान न हो। सभी सुखी संपन्न एव निश्चित जीवन यापन करेंगे।
- सर्वोदय- गांधीजी सभी लोगो की उन्नति उदय एवं कल्याण मे विश्वास करते थे। उनका विश्वास था कि उपेक्षित गरीबो के उत्थान से ही समाज एवं राष्ट्र की प्रगति संभव है।
- छूआछूत विरोधी- छूआछूत समाज का एक गम्भीर दोष रहा है। गांधीजी समाज में व्याप्त छूआछूत को मिटाकर सामाजिक एकता स्थापित करना चाहते थे समाज में अछूतो के विकास एवं कल्याण के लिए उन्होने उनको ''हरिजन'' नाम दिया।
- विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था तथा न्यासधारिता का सिध्दांत- गांधीवाद मे आर्थिक विकेन्द्रीकरण के साथ साथ न्यासधारिता के सिध्दांत का भी उल्लेख किया गया है उनका विचार था कि पूंजीपतियो को हृदय परिवर्तन द्वारा सम्पत्ति की न्यासी (ट्रस्टी) बना दिया जाय और पूंजीपति उस सम्पत्ति का प्रयोग सम्पूर्ण समाज के हित के लिये करें।
- साध्य तथा साधन- गांधीवाद पूर्णतया एक नैतिक दर्शन है। साध्य के साथ साथ साधन भी नैतिक हो इस बात पर गांधीवाद में विशेष जोर दिया गया है। उनका मत था कि यदि पवित्र साधन नही मिलते हो तो उस साध्य को ही छोड़ दो।
- विश्व बन्धुत्व और अन्तर्राष्ट्रवाद का समर्थन- गांधीजी मानव कल्याण के समर्थक थे। वे समस्त मानव का हित चिंतन करते थे। उनहोने सामा्रजयवाद का विरोध किया तथा विश्व शांति तथा अन्तर्राष्ट्रवाद का समर्थन किया।
- गांधीजी के मतानुसार - ''परमात्मा ही सत्य है शुध्द अन्तरात्मा की वाणी ही सत्य है। लोक सेवा ईश्वर प्राप्ति के साधन का आवश्यक अंग है। गांधीजी मानव समूह को भगवान का विराट रूप मानते थे और उनकी सेवा को भगवान की सेवा।''
- एक व्यावहारिक दर्शन- गांधीवाद वास्तविकता पर आधारित है। गांधीजी कर्मयोगी थे। कर्म मे विश्वास करते थे। उनका दर्शन उनके निजी अनुभवो सत्य के प्रयोगो आरै अहिंसा पर आधारित है।
- सत्याग्रह- गांधीवाद का मूल आधार सत्याग्रह है। सत्याग्रह का अर्थ सत्य को आरूढ़ करना। सत्याग्रह मे छलकपट धोखा का परित्याग कर प्रेम एवं सत्य के नैतिक शास्त्र का प्रयोग करना पडता है। सत्याग्रह तो शक्तिशाली और वीर मनुष्य का शस्त्र है।
- अहिंसा पर आधारित- गांधीजी का मत था कि अहिंसा के आधार पर ही एक सुव्यवस्थित स माज की स्थापना और मानव जीवन की भावी उन्नति हो सकती है। अहिंसा का अर्थ किसी भी रूप मे अन्य किसी व्यक्ति को कष्ट न पहुंचाना है। एवं अत्याचारी की इच्छा का आत्मिक बल के आधार पर प्रतिरोध करना भी है। अहिंसा आत्मिक बल का प्रतीक है।
- आदर्श राज्य की स्थापना- गांधीजी अहिंसा पर आधारित ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते थे। जिसमे समस्त मानव सदगुणी एवं विवेकशील हो । उसमें स्वार्थमयी हितो का कोई स्थान न हो। सभी सुखी संपन्न एव निश्चित जीवन यापन करेंगे।
- सर्वोदय- गांधीजी सभी लोगो की उन्नति उदय एवं कल्याण मे विश्वास करते थे। उनका विश्वास था कि उपेक्षित गरीबो के उत्थान से ही समाज एवं राष्ट्र की प्रगति संभव है।
- छूआछूत विरोधी- छूआछूत समाज का एक गम्भीर दोष रहा है। गांधीजी समाज में व्याप्त छूआछूत को मिटाकर सामाजिक एकता स्थापित करना चाहते थे समाज में अछूतो के विकास एवं कल्याण के लिए उन्होने उनको ''हरिजन'' नाम दिया।
- विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था तथा न्यासधारिता का सिध्दांत- गांधीवाद मे आर्थिक विकेन्द्रीकरण के साथ साथ न्यासधारिता के सिध्दांत का भी उल्लेख किया गया है उनका विचार था कि पूंजीपतियो को हृदय परिवर्तन द्वारा सम्पत्ति की न्यासी (ट्रस्टी) बना दिया जाय और पूंजीपति उस सम्पत्ति का प्रयोग सम्पूर्ण समाज के हित के लिये करें।
- साध्य तथा साधन- गांधीवाद पूर्णतया एक नैतिक दर्शन है। साध्य के साथ साथ साधन भी नैतिक हो इस बात पर गांधीवाद में विशेष जोर दिया गया है। उनका मत था कि यदि पवित्र साधन नही मिलते हो तो उस साध्य को ही छोड़ दो।
- विश्व बन्धुत्व और अन्तर्राष्ट्रवाद का समर्थन- गांधीजी मानव कल्याण के समर्थक थे। वे समस्त मानव का हित चिंतन करते थे। उनहोने सामा्रजयवाद का विरोध किया तथा विश्व शांति तथा अन्तर्राष्ट्रवाद का समर्थन किया।
- गांधीजी के मतानुसार - ''परमात्मा ही सत्य है शुध्द अन्तरात्मा की वाणी ही सत्य है। लोक सेवा ईश्वर प्राप्ति के साधन का आवश्यक अंग है। गांधीजी मानव समूह को भगवान का विराट रूप मानते थे और उनकी सेवा को भगवान की सेवा।''
- एक व्यावहारिक दर्शन- गांधीवाद वास्तविकता पर आधारित है। गांधीजी कर्मयोगी थे। कर्म मे विश्वास करते थे। उनका दर्शन उनके निजी अनुभवो सत्य के प्रयोगो आरै अहिंसा पर आधारित है।
- सत्याग्रह- गांधीवाद का मूल आधार सत्याग्रह है। सत्याग्रह का अर्थ सत्य को आरूढ़ करना। सत्याग्रह मे छलकपट धोखा का परित्याग कर प्रेम एवं सत्य के नैतिक शास्त्र का प्रयोग करना पडता है। सत्याग्रह तो शक्तिशाली और वीर मनुष्य का शस्त्र है।
- अहिंसा पर आधारित- गांधीजी का मत था कि अहिंसा के आधार पर ही एक सुव्यवस्थित स माज की स्थापना और मानव जीवन की भावी उन्नति हो सकती है। अहिंसा का अर्थ किसी भी रूप मे अन्य किसी व्यक्ति को कष्ट न पहुंचाना है। एवं अत्याचारी की इच्छा का आत्मिक बल के आधार पर प्रतिरोध करना भी है। अहिंसा आत्मिक बल का प्रतीक है।
- आदर्श राज्य की स्थापना- गांधीजी अहिंसा पर आधारित ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते थे। जिसमे समस्त मानव सदगुणी एवं विवेकशील हो । उसमें स्वार्थमयी हितो का कोई स्थान न हो। सभी सुखी संपन्न एव निश्चित जीवन यापन करेंगे।
- सर्वोदय- गांधीजी सभी लोगो की उन्नति उदय एवं कल्याण मे विश्वास करते थे। उनका विश्वास था कि उपेक्षित गरीबो के उत्थान से ही समाज एवं राष्ट्र की प्रगति संभव है।
- छूआछूत विरोधी- छूआछूत समाज का एक गम्भीर दोष रहा है। गांधीजी समाज में व्याप्त छूआछूत को मिटाकर सामाजिक एकता स्थापित करना चाहते थे समाज में अछूतो के विकास एवं कल्याण के लिए उन्होने उनको ''हरिजन'' नाम दिया।
- विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था तथा न्यासधारिता का सिध्दांत- गांधीवाद मे आर्थिक विकेन्द्रीकरण के साथ साथ न्यासधारिता के सिध्दांत का भी उल्लेख किया गया है उनका विचार था कि पूंजीपतियो को हृदय परिवर्तन द्वारा सम्पत्ति की न्यासी (ट्रस्टी) बना दिया जाय और पूंजीपति उस सम्पत्ति का प्रयोग सम्पूर्ण समाज के हित के लिये करें।
- साध्य तथा साधन- गांधीवाद पूर्णतया एक नैतिक दर्शन है। साध्य के साथ साथ साधन भी नैतिक हो इस बात पर गांधीवाद में विशेष जोर दिया गया है। उनका मत था कि यदि पवित्र साधन नही मिलते हो तो उस साध्य को ही छोड़ दो।
- विश्व बन्धुत्व और अन्तर्राष्ट्रवाद का समर्थन- गांधीजी मानव कल्याण के समर्थक थे। वे समस्त मानव का हित चिंतन करते थे। उनहोने सामा्रजयवाद का विरोध किया तथा विश्व शांति तथा अन्तर्राष्ट्रवाद का समर्थन किया।
- गांधीजी के मतानुसार - ''परमात्मा ही सत्य है शुध्द अन्तरात्मा की वाणी ही सत्य है। लोक सेवा ईश्वर प्राप्ति के साधन का आवश्यक अंग है। गांधीजी मानव समूह को भगवान का विराट रूप मानते थे और उनकी सेवा को भगवान की सेवा।''
- एक व्यावहारिक दर्शन- गांधीवाद वास्तविकता पर आधारित है। गांधीजी कर्मयोगी थे। कर्म मे विश्वास करते थे। उनका दर्शन उनके निजी अनुभवो सत्य के प्रयोगो आरै अहिंसा पर आधारित है।
- सत्याग्रह- गांधीवाद का मूल आधार सत्याग्रह है। सत्याग्रह का अर्थ सत्य को आरूढ़ करना। सत्याग्रह मे छलकपट धोखा का परित्याग कर प्रेम एवं सत्य के नैतिक शास्त्र का प्रयोग करना पडता है। सत्याग्रह तो शक्तिशाली और वीर मनुष्य का शस्त्र है।
- अहिंसा पर आधारित- गांधीजी का मत था कि अहिंसा के आधार पर ही एक सुव्यवस्थित स माज की स्थापना और मानव जीवन की भावी उन्नति हो सकती है। अहिंसा का अर्थ किसी भी रूप मे अन्य किसी व्यक्ति को कष्ट न पहुंचाना है। एवं अत्याचारी की इच्छा का आत्मिक बल के आधार पर प्रतिरोध करना भी है। अहिंसा आत्मिक बल का प्रतीक है।
- आदर्श राज्य की स्थापना- गांधीजी अहिंसा पर आधारित ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते थे। जिसमे समस्त मानव सदगुणी एवं विवेकशील हो । उसमें स्वार्थमयी हितो का कोई स्थान न हो। सभी सुखी संपन्न एव निश्चित जीवन यापन करेंगे।
- सर्वोदय- गांधीजी सभी लोगो की उन्नति उदय एवं कल्याण मे विश्वास करते थे। उनका विश्वास था कि उपेक्षित गरीबो के उत्थान से ही समाज एवं राष्ट्र की प्रगति संभव है।
- छूआछूत विरोधी- छूआछूत समाज का एक गम्भीर दोष रहा है। गांधीजी समाज में व्याप्त छूआछूत को मिटाकर सामाजिक एकता स्थापित करना चाहते थे समाज में अछूतो के विकास एवं कल्याण के लिए उन्होने उनको ''हरिजन'' नाम दिया।
- विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था तथा न्यासधारिता का सिध्दांत- गांधीवाद मे आर्थिक विकेन्द्रीकरण के साथ साथ न्यासधारिता के सिध्दांत का भी उल्लेख किया गया है उनका विचार था कि पूंजीपतियो को हृदय परिवर्तन द्वारा सम्पत्ति की न्यासी (ट्रस्टी) बना दिया जाय और पूंजीपति उस सम्पत्ति का प्रयोग सम्पूर्ण समाज के हित के लिये करें।
- साध्य तथा साधन- गांधीवाद पूर्णतया एक नैतिक दर्शन है। साध्य के साथ साथ साधन भी नैतिक हो इस बात पर गांधीवाद में विशेष जोर दिया गया है। उनका मत था कि यदि पवित्र साधन नही मिलते हो तो उस साध्य को ही छोड़ दो।
- विश्व बन्धुत्व और अन्तर्राष्ट्रवाद का समर्थन- गांधीजी मानव कल्याण के समर्थक थे। वे समस्त मानव का हित चिंतन करते थे। उनहोने सामा्रजयवाद का विरोध किया तथा विश्व शांति तथा अन्तर्राष्ट्रवाद का समर्थन किया।
<no title>गाँधी वाद की विशेषताएँ ;150 वीं जयंती पर विशेष।